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बचपन के समय की त्यौहारों की यादें।

इस वर्ष कोरोना व लाॅकडाउन के चलते त्यौहारों का रंग और जोश फीका हो गया।

सावन के सीजन में पड़ने वाले त्यौहार जैसे शिव भक्तों के सोमवार, रक्षाबंधन, कृष्ण जन्माष्टमी, 15 अगस्त और 22 अगस्त को आने वाली गणेश चतुर्थी सब बहुत ही सांकेतिक रूप से मनाये जा रहे हैं।

ऐसे मे त्यौहारों की बचपन की स्मृतियाँ और उल्लास रह- रहकर याद आ जाता है।


मथुरा स्टाइल श्रीकृष्ण जी की प्रतिमा का रेखांकन
मथुरा स्टाइल श्रीकृष्ण जी की प्रतिमा का रेखांकन

अपने बेवर के सब्जी मण्डी बाजार मे स्थित बड़ा मन्दिर अपने कृष्णाष्टमी उत्सव के लिए जाना जाता है। अब तो इसका नये रूप में जीर्णोद्धार हो गया है पहले यह वृन्दावन स्टाइल के प्योर देशी स्वरूप मे स्थापित था। इसी के प्रांगण मे नेशनल पब्लिक स्कूल हुआ करता था। त्यौहार के सीजन मे हम स्कूली बच्चे अक्सर यहाँ अपना डेरा सा ज़मा लेते थे। विभिन्न तैयारियों को अपना आकार लेते हुए बड़े कौतुहल से देखते रहते थे। रंगाई - पुताई, श्रंगार। यहीं पर शोभा यात्रा मे बैलगाड़ी मे लगने वाला रथ भी खड़ा रहता था जो विभिन्न धार्मिक अवसरों पर सजधजकर शहर के मुख्य मार्गो पर निकाला जाता था।

कृष्णजन्माष्टमी का हम बच्चों मे खासा उत्साह रहता था। हम में से कुछ कलाकार बच्चे अपनी नन्हीं कृष्ण झांकी खुद अपने घर के बरामदें या द्वार के सामने गली ही में बना लेते थे। ईट- पत्थर के टुकड़ों से छोटे - छोटे पुल और जेल बनती थी, कारागार के इस स्वरूप मे बहुत छोटी कृष्ण जन्म की मूर्ति रख दी जाती थी। शीशे को जमीन मे लगा यमुना के पानी का आभास दिया जाता था। ओर पास मिट्टी लगातार तट और रूई को हरे रंग से रंगकर झाड़ियों का आभास दिया जाता था। फिर हम मे से कुछ फूल व पत्ते लाकर इसे और सजीव करने की कोशिश करते थे।

फोटो साभार: मेहुल बाटलीवाला (जन्माष्टमी डेकोरेशन, यूट्यूब)
फोटो साभार: मेहुल बाटलीवाला (यूट्यूब)

इस पूरी प्रकिया मे हमारे मन मे कृष्ण के जन्म की पूरी कथा एक फिल्म की तरह जीवन्त हो उठती थी।

ऐसे मे हमे घर से भी खूब सहयोग और बढ़ावा मिलता था। पंजीरी और कटे फलों का प्रसाद बड़ी बहन या मां बनाकर दे देतीं थीं। फिर हम सब बच्चे अगरबत्ती,धूपबत्ती और दीपक जला बैठ जाते। उस समय यह चाइनीज़ लाइट और प्लास्टिक आइटम नहीं हुआ करते थे। लगभग सभी चीजें आर्गेनिक थीं।

गुजरने वाले सभी लोग चाव से झांकी को निहारते और तारीफ कर निकलते, और कुछ लोग पच्चीस पैसे का सिक्का चढाकर नमन करते तो हमारी खुशी का ठिकाना न रहता।

हम भी रात मे विभिन्न मन्दिरों और झांकियों की सैर को निकलते पंजीरी,कटे फलों का प्रसाद और दूध-दही का चरणामृत खाते खाते ही पेट भर जाता था।

तो हमारे बचपन के त्यौहारों का सीजन लम्बा और ज़मीनी आत्मीयता से भरा था न कि व्हाट्सएप्प शुभकामनाओं से।



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